॥ ॐ श्री गणेशाय नमः ॥ • शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
श्री दुर्गा सप्तशती • Argala Stotram

श्री अर्गला स्तोत्रम् (Argala Stotram)

"दुर्गा सप्तशती का परम फलदायी स्तोत्र: "रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि""

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॥ विनियोगः ॥

ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥

1श्लोक 1

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

हिन्दी भावार्थ: जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा: इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! आपको मेरा सादर प्रणाम है।

2श्लोक 2

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणी। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥

हिन्दी भावार्थ: हे देवि चामुण्डे! आपकी जय हो। हे समस्त प्राणियों की पीड़ा हरने वाली! आपकी जय हो। हे सबमें व्याप्त रहने वाली देवि! आपकी जय हो। हे कालरात्रि! आपको मेरा नमस्कार है।

3श्लोक 3

मधुकैटभविद्रावि विधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: मधु और कैटभ को परास्त करने वाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देने वाली हे देवि! आपको नमस्कार है। आप मुझे दिव्य आत्म-स्वरूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और मेरे काम-क्रोध आदि कामुक शत्रुओं का नाश कीजिए।

4श्लोक 4

महिषासुरनिर्णDefaultाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: महिषासुर का संहार करने वाली तथा भक्तों को परम सुख प्रदान करने वाली हे देवि! आपको प्रणाम है। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।

5श्लोक 5

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: रक्तबीज का वध करने वाली और चण्ड-मुण्ड का संहार करने वाली हे देवि! मुझे रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का शमन कीजिए।

6श्लोक 6

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: शुम्भ, निशुम्भ और धूम्रलोचन का मर्दन करने वाली हे भगवती! मुझे रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और काम-क्रोध रूपी शत्रुओं का संहार कीजिए।

7श्लोक 7

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: सबके द्वारा पूजित चरणों वाली और समस्त सौभाग्य प्रदान करने वाली हे देवि! मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।

8श्लोक 8

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: अचिन्त्य रूप और अद्भुत चरित्र वाली, सब शत्रुओं का नाश करने वाली हे देवि! मुझे आत्म-ज्ञान का रूप दीजिए, विजय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का शमन कीजिए।

9श्लोक 9

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: भक्तिपूर्वक नतमस्तक होने वाले भक्तों के पापों को हरने वाली हे चण्डिके! मुझे रूप, विजय, यश प्रदान कर समस्त आंतरिक-बाह्य शत्रुओं का नाश कीजिए।

10श्लोक 10

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: भक्तिपूर्वक स्तुति करने वाले भक्तों के समस्त शारीरिक व मानसिक रोगों का नाश करने वाली हे चण्डिके! मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।

11श्लोक 11

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: हे चण्डिके! जो लोग इस संसार में निरंतर भक्तिभाव से आपकी अर्चना करते हैं, उन्हें रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और उनके शत्रुओं का नाश कीजिए।

12श्लोक 12

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: मुझे सौभाग्य और आरोग्य दीजिए। मुझे परम सुख और मोक्ष दीजिए। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए।

13श्लोक 13

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए, मुझे अत्यधिक शारीरिक व आत्मिक बल दीजिए। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।

14श्लोक 14

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: हे देवि! मेरा कल्याण कीजिए। मुझे परम ऐश्वर्य और लक्ष्मी प्रदान कीजिए। मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का शमन कीजिए।

15श्लोक 15

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

हिन्दी भावार्थ: देवताओं और असुरों के मुकुटों की मणियों से घिसे हुए पावन चरणों वाली हे अम्बिके! मुझे रूप दीजिए, जय दीजिए, यश दीजिए और शत्रुओं का नाश कीजिए।

16श्लोक 16

भार्यां मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

हिन्दी भावार्थ: हे जगदम्बिके! मुझे मनोनुकूल चलने वाली, सुंदर, उत्तम कुल में उत्पन्न तथा इस दुर्गम संसार-सागर से तारने वाली श्रेष्ठ भार्या (जीवनसंगिनी) प्रदान कीजिए।

17श्लोक 17

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति दुर्लभम्॥

हिन्दी भावार्थ: जो मनुष्य इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करके दुर्गा सप्तशती महास्तोत्र का पाठ करता है, वह सप्तशती के जप का दुर्लभ और उत्तम फल प्राप्त करता है।

श्री अर्गला स्तोत्र के पाठ का विशेष फल एवं लाभ:

✓सर्वत्र विजय एवं यश की प्राप्ति
✓कठिन से कठिन रोगों एवं असाध्य व्याधियों से मुक्ति
✓शत्रु भय, कोर्ट-कचहरी व तांत्रिक बाधाओं का शमन
✓योग्य जीवनसाथी एवं पारिवारिक सुख-समृद्धि
✓नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती पाठ का संपूर्ण महाफल