"अखंड सौभाग्य, सुहाग की दीर्घायु एवं चंद्र दर्शन अर्घ्य विधान"
🕒 पठन समय: 10-12 मिनट📅 शुभ दिन: कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि🕉️ आराध्य: माता चौथ (करवा माता), भगवान शिव-पार्वती एवं चंद्र देव
कथा का महात्म्य एवं सार:करवा चौथ का पावन निर्जला व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और दांपत्य सुख के लिए करती हैं। सांध्य काल में करवा माता की पूजा व कथा श्रवण के उपरांत रात्रि में छलनी से चंद्र दर्शन कर अर्घ्य दिया जाता है।
सम्पूर्ण कथा के अध्याय (Chapters):
1रानी वीरवती की कथा: भाइयों का अतिस्नेह और कपटी चंद्रमा
प्राचीन काल में एक ब्राह्मण के सात पुत्र और एक गुणवती पुत्री वीरवती थी। विवाह के उपरांत वीरवती ने मायके में करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा। भूख-प्यास से व्याकुल बहन की दशा देखकर भाइयों ने पीपल के वृक्ष के पीछे एक विशाल छलनी में जलता हुआ दीपक रखकर चंद्रमा का आभास करा दिया और बहन से कहा कि चंद्रोदय हो गया है। वीरवती ने विश्वास कर अर्घ्य दे दिया और भोजन कर लिया।
2पति की मृत्यु एवं माता इंद्राणी का समाधान
भोजन का पहला ग्रास लेते ही वीरवती के पति की मृत्यु का समाचार आ गया। वीरवती विलाप करने लगी। तब देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने आकर उसे बताया कि उसने बिना चंद्रमा के उदय हुए व्रत भंग कर दिया था। यदि वह वर्ष पर्यंत प्रत्येक माह की चतुर्थी का व्रत करे और आगामी करवा चौथ का विधिवत निर्जला पालन करे, तो उसका पति पुनः जीवित हो जाएगा।
3तपस्या का फल और पति का पुनर्जीवन
वीरवती ने अत्यंत निष्ठा और तपस्या के साथ संपूर्ण नियमों का पालन करते हुए करवा चौथ का व्रत किया। माता करवा और भगवान शिव-पार्वती ने प्रसन्न होकर उसके पति को नवजीवन प्रदान किया। तब से यह व्रत अखंड सुहाग का परम प्रतीक माना जाता है।
🧺 आवश्यक पूजन सामग्री:
✓मिट्टी अथवा पीतल का करवा (टोंटीदार)
✓पूजा की छलनी (छानी)
✓सींक (करवे की टोंटी में लगाने हेतु)
✓कच्चा दूध, रोली, अक्षत, धूप-दीप
✓सरगी की सामग्री (मेवा, फल, मिठाई, सुहाग का सामान)
🪔 उद्यापन एवं व्रत नियम:
सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण करें। दिनभर निर्जला उपवास रखें। सायंकाल 16 श्रृंगार कर करवा माता की पूजा करें और सात बार करवे की अदला-बदली करें। रात्रि में चंद्र दर्शन कर पति का मुख देखकर जल ग्रहण करें।