1शीला का सदाचार और पति का कुमार्ग
एक नगर में शीला नाम की एक धर्मपरायण स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। उसका पति पहले बहुत अच्छा था, परंतु बुरी संगति में पड़कर जुआ, मदिरा और अनैतिक कार्यों में अपना सारा धन गंवा बैठा। घर में अन्न का दाना तक नहीं बचा।
लोड हो रहा है, कृपया प्रतीक्षा करें...
"दारिद्र्य नाशिनी, धन-धान्य एवं अष्टलक्ष्मी सिद्धि प्रदायक शुक्रवार व्रत"
एक नगर में शीला नाम की एक धर्मपरायण स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। उसका पति पहले बहुत अच्छा था, परंतु बुरी संगति में पड़कर जुआ, मदिरा और अनैतिक कार्यों में अपना सारा धन गंवा बैठा। घर में अन्न का दाना तक नहीं बचा।
एक शुक्रवार की दोपहर एक वृद्ध माता शीला के द्वार पर आईं। शीला ने सत्कार किया। वृद्धा ने उसे माता वैभव लक्ष्मी के व्रत की गुप्त विधि बताई। शीला ने पूर्ण निष्ठा से श्रीयंत्र और सोने/चांदी के सिक्के के सम्मुख शुक्रवार को खीर का भोग लगाकर व्रत किया।
व्रत के प्रभाव से शीला के पति की बुद्धि शुद्ध हो गई। उसने समस्त व्यसनों का त्याग कर पुनः व्यापार प्रारंभ किया और कुछ ही महीनों में उनका घर धन-धान्य और वैभव से परिपूर्ण हो गया।
सायंकाल पाटा बिछाकर लाल वस्त्र पर चावल की ढेरी बनाएं, उस पर जल से भरा तांबे का लोटा और सिक्के की पूजा करें। माता को खीर का भोग लगाएं और कम से कम 7 स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी पुस्तक भेंट करें।